Tweet
Facebook

About Gaya Ji Dham

गया में पिंडदान से मिलता है मोक्ष

पिंडदान के लिए सर्वोत्तम स्थान है गया

हिंदू मान्यताओं और वैदिक परम्परा के अनुसार पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक होता है, जब वह अपने जीवित माता-पिता की सेवा करें और उनके मरणोपरांत उनकी बरसी पर तथा पितृपक्ष में उनका विधिवत श्राद्ध करें। विद्वानों के मुताबिक किसी वस्तु के गोलाकर रूप को पिंड कहा जाता है। प्रतीकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड कहा जाता है। पिंडदान के समय मृतक की आत्मा को अर्पित करने के लिए जौ या चावल के आटे को गूंथकर बनाई गई गोलाकृत्ति को पिंड कहते हैं।

श्राद्ध की मुख्य विधि में मुख्य रूप से तीन कार्य होते हैं, पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज। दक्षिणाविमुख होकर आचमन कर अपने जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर चावल, गाय का दूध, घी, शक्कर एवं शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना पिंडदान कहलाता है।

जल में काले तिल, जौ, कुशा एवं सफेद फूल मिलाकर उससे विधिपूर्वक तर्पण किया जाता है। मान्यता है कि इससे पितृ तृप्त होते हैं। इसके बाद ब्राह्मण भोज कराया जाता है। पंडों के मुताबिक शास्त्रों में पितृ का स्थान बहुत ऊंचा बताया गया है। उन्हें चंद्रमा से भी दूर और देवताओं से भी ऊंचे स्थान पर रहने वाला बताया गया है।

पितृ की श्रेणी में मृत पूर्वजों, माता, पिता, दादा, दादी, नाना, नानीसहित सभी पूर्वज शामिल होते हैं। व्यापक दृष्टि से मृत गुरू और आचार्य भी पितृ की श्रेणी में आते हैं।

कहा जाता है कि गया में पहले विभिन्न नामों के 360 वेदियां थीं जहां पिंडदान किया जाता था। इनमें से अब 48 ही बची है। वैसे कई धार्मिक संस्थाएं उन पुरानी वेदियों की खोज की मांग कर रही है। वर्तमान समय में इन्हीं वेदियों पर लोग पितरों का तर्पण और पिंडदान करते हैं। यहां की वेदियों में विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी के किनारे और अक्षयवट पर पिंडदान करना जरूरी माना जाता है। इसके अतिरिक्त वैतरणी, प्रेतशिला, सीताकुंड, नागकुंड, पांडुशिला, रामशिला, मंगलागौरी, कागबलि आदि भी पिंडदान के लिए प्रमुख है। यही कारण है कि देश में श्राद्घ के लिए 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है जिसमें बिहार के गया का स्थान सर्वोपरि है।

क्यों करना आवश्यक है गया जी मे पिंडदान

पिंडदान के लिए सर्वोत्तम स्थान है गया

ॐ नमो नारायणाय ॐ गदाधराय नमः

पृथ्वियां च गया पुण्या गयायां च गायशिरः।श्रेष्ठम तथा फल्गुतीर्थ तनमुखम च सुरस्य हिं।। श्राद्धरम्भे गयायं ध्यात्वा ध्यात्वा देव गदाधर ।स्व् पितृ मनसा ध्यात्वा ततः श्राद्ध समाचरेत ।। श्री गया तीर्थ कि महिमा तो अनन्त हैं जिसका उल्लेख हमें समस्त पुराणों में मिलता है । गया तीर्थ श्राद्ध श्रेष्ठ पावन भूमि है यहाँ भगवान विष्णु नारायण गदाधर विष्णु पाद के रूप में स्थित है ।जो अपनी शक्ति से सभी प्रकार के पापो का नाश कर मनोनुकूल फल प्रदान करते है ,तथा उनके सभी असंतृप्प्त पितरों को तृप्ति मुक्ति प्रदान करते है ।

शास्त्रो में मुक्ति प्राप्ति के मार्ग प्रशस्त किए है ।जिसमे सबसे सुलभ एवम उपयुक्त्त गया श्राद्ध है ब्राह्मज्ञानम गयाश्राद्धम गोगृहे मरणं तथा , वासः पुसाम कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषां चतुर्विधा । ब्रह्मज्ञानेंन किंम कार्य: गोगृहे मरणेन किंम, वासेंन किं कुरुक्षेत्रे यदि पुत्रो गयाम व्रजेत।। पुत्रो को गया तीर्थ पुत्र होने कि संज्ञा और अधिकार देता है ।

गया श्राद्ध करना पुत्र का कर्तव्य है।ऐसा न करने पर उनके पितर और शास्त्र दोनों ही पुत्र होने की संज्ञा नहीं देते ।शास्त्रो के श्लोकानुसार पुत्र का कर्तव्य निर्धारित है श्लोक - जीवते वाक्यकरणात क्षयायः भूरी भोजनात।

गयायां पिंडदानेषु त्रिभि पुत्रस्य पुत्रता (गरुड़ पुराण ,स्कन्द पुराण ) जीवित अवस्था में माता पिता के (वाक्य ) आज्ञा का पालन करना प्रथम कर्तव्य है ,मरणोपरांत भूरी भोजन कराना द्वितीय कर्तव्य है , तथा गया श्राद्ध करना तृतीय कर्तव्य है श्लोकानुसार इन तीनो कर्तव्यों का निर्वहन करने पर ही पुत्र को पुत्रत प्राप्त होती है,अन्यथा वे पुत्र कहलाने योग्य नहीं । पु0 नाम नरकाय त्रायते इति पुत्र : (गरुड़ पुराण ) पुत्र वही है जो अपने पितरों को पु0नाम नामक नर्क से मुक्ति दिलाता हो । अतः मानव का परम कर्तव्य है कि पितृगणों के उद्धार एवं प्रसन्नता के निमित्त गया श्राद्ध करे अवश्य करे और अपने पुत्रत्व को सार्थक बनाये । शास्त्रों में वर्णित गया -श्राद्ध का लाभ भौतिक जीवन के आशातीत आकांक्षाओ से भी अधिक लाभ है उदाहरणतः वह कार्य जो एक मानव का भूप नरेश होने पर भी कर पाना उसके लिये संभव नहीं है ।कुछ ऐसा ही फलदायीं है गया श्राद्ध । ततो गया समासध बर्ह्मचारी समाहितः। अश्वमेधवाप्नोति कुलः चैव समुद्धरेत।।(वायु पुराण ) जो व्यक्ति गया जाकर एकाग्रचित हो विधिवत ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है एवं समस्त कुलों का उद्धार करता है आयु : प्रजा : धनं विधां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च । प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितर: श्राद्धप्रिता ।।(मार्कण्डे पुराण याज्ञ स्मृति) श्राद्धकर्ता को उनके पितर द्रिघायु ,संतति ,धनधान्य , विद्या राज्य सुख पुष्टि ,यश कृति ,बल, पशु ,श्री ,स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करते है गया तीर्थ पुरोहित - पं गोकुल दुबे 9334720974,7781959952

पितृ पक्ष विशेष -

भारतीय संस्कृति सनातन धर्म मे पितृ ऋण से मुक्त होने लिये अपने पिता -माता तथा परिवार के मृत प्राणियों के निमित श्राद्ध करने कीअनिवार्य आवश्यकता बताई गई है । श्राद्ध कर्म को पितृ कर्म भी कहते है ।पितृ कर्म से तातपर्य पितृ पूजा से है ।

सामान्यतः कई लोग माता पिता के मृत्यु के उपरांत और्ध्वदेहिक संस्कार ,दशगात्र ,सपिण्डन आदि संस्कार तो करते है ,परन्तु आलस्य औऱ प्रमादवश गया तीर्थ जाकर पिण्डदान श्राद्ध करने का महत्व नही समझते ।
किसी को संतान नही होती या विपत्तियां आते रहती है तो बताया जाता है कि इसका कारण पितृदोष है ,गया श्राद्ध से इसका निवारण हो सकता है ,तब वे अपने कामना के पूर्ति के गया श्राद्ध को जाते है ,किन्तु गया श्राद्ध पुत्रों का कर्तव्य है । प्रेत प्रेतत्वनिर्मुक्त: (वायु पुराण ) गया जी मे पिण्डदान से प्रेतों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है ।
यह गया तीर्थ पितरों को अत्यंत प्रिय है पितृणाम चातीवल्लभम । (कूर्म पुराण )
गयायां पितृरूपेण स्वमेव जनार्दन:।।तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं मुच्यते वै ऋणत्रयात ।
तरिता: पितरस्तेण स याति परमां गतिम।

गया तीर्थ पुरोहित - पंडित गोकुल दुबे
गया जी
संपर्क सूत्र 9334720974 ,7781959952

8

Our Services

4810

Members

5

Awards

245

Instructors

Vrihada Gaya Shradh


In khapar Gaya Shraddtha Pilgrims have to cover 54vedis and the name of vedis are listed below where pilgrims have to perform Pind Daan:

Vrihada Gaya Shradh

  • Poonpoon charanPuja
  • Falgu River
  • Brahma Kund
  • Pretshilla
  • Ram Shilla
  • Ram Kund
  • Kagbali
  • Uttarmanas
  • Udichi
  • Kankhal
  • Dakhin Manas
  • Jiwha loll
  • Gajadhar Jee
  • Sarswati
  • Dharmaranya
  • BodhGaya
  • Brahma Sarower
  • Kagbali

Vrihada Gaya Shradh

  • Amrasichen
  • Rudrapada
  • Brahmapada
  • Vishnupada
  • Kartikpada
  • Dhadikhagni
  • Garpashagni
  • Ahabaniagni
  • Suryapada
  • Chandrapada
  • Ganeshpada
  • Sandyagnipada
  • Yagnipada
  • Dadhisthi pada
  • Kanna pada
  • Mat Gowapi
  • Ko Pada
  • Agastha Pada

Vrihada Gaya Shradh

  • Indrapada
  • Kahsyapada
  • Gajakaran
  • RamGaya
  • SitaKund
  • Souvagyadan
  • Gayasir
  • Gayakup
  • Munda Pristha
  • Adi Gaya
  • Dhout Pada
  • Bhim Gaya
  • Go Prachar
  • Gada Loll
  • Dhud Tarpan
  • Baitarni
  • AkshoyBata
  • Gyatri Ghat
s